ऑटिज्म की हर नई कहानी हमें रोज रुलाती है,
खो जाता हूँ कहीं और ही, कुछ गहरी सोच में,
ख्यालों में हमें बहुत पीछे धकेल जाती है।
गुज़र गया जो मुश्किल वक्त, उसकी फिर से तस्वीर दिखाती है,
दो साल के संस्कार और सात्विक की यादों में ले जाती है
बच्चों की मासूमियत और माँ-बाप का दर्द सुनाती है,
औलाद का दुःख क्या होता है इसका एहसास बार-बार कराती है
सोचता रहता हूँ दिन भर इन मासूमों के बारे में,
क्या रिश्ता है मेरा इन बच्चों से, क्यों ये मुझे सताती है,
बहुत संस्कार और सात्विक हैं अभी भी, ठीक करने को,
जिम्मेदारी भरी ये पुकार मुझे हर दिन बुलाती है
मेरी यात्रा अभी बहुत लंबी है इन सबके साथ,
ये दुःख भरी दास्तानें, मुझे बहुत सताती हैं,
ज़िंदगी कब किस वक्त हमें किसी मोड़ पे ले जाती है,
पर हर पल कुछ-न-कुछ नया सिखा जाती है
हर रोज़ की नई ईमेल्स में लिखे दर्द भरे शब्द
हमें हर माँ-बाप की चीख-पुकार सुनाती हैं,
हर कहानी में छुपा हुआ दर्द और संघर्ष
हमें एक और ज़िंदगी बदलने के लिए तैयार कर जाती है,
आँखों के सामने संस्कार, सात्विक का इतिहास दोहराती है,
ऑटिज्म की हर नई कहानी हमें बहुत रुलाती है
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